प्रिये जुली ,
तुम आब्तक नहीं मुचे नहीं भूली
कितने सवान कितने भादू बीते
पैर तेरे प्यार की गंगा अभी भी है सूखी
बहुत खूबसूरत थे वो पल जब होते थे साथ हम
एसे जैसे कल की ही बात हो
नेटवर्क का लेक्टुरे है और हम साथ हो
मैंने कागज की प्लान बना कर तुम्हें भेजी
पैर लगी मास्टर के हाँथ ho