Sunday, July 17, 2011

व्यथा

निकट निरंटर देख सत्रू सामंत
विकत संकट युक्त रावन सुने भ्राता अंत
जो थे काल जाई रक्ष कुल नायक
थे आज पड़े खंडीत सुनील के समान्त||

विह्वल मन दशानन शुक संतप्त लंका मैं
एकल मन विचरते सम्रंगन शंका से
यह युद्ध है उपस्थीत गो चारो क चार से
या गिरी है गाज हमारे ही चल से ||

सुना था न कभी यूं तरते पाशान को
बेध दे वज्र तुल्ये वक्ष उस बाण को
हे शिव क्या करून मानूष राम को ||

Tuesday, December 14, 2010

क्या रखा है तेरे प्यार मैं जुली ....

प्रिये जुली ,
तुम आब्तक नहीं मुचे नहीं भूली
कितने सवान कितने भादू बीते
पैर तेरे प्यार की गंगा अभी भी है सूखी

बहुत खूबसूरत थे वो पल जब होते थे साथ हम
एसे जैसे कल की ही बात हो
नेटवर्क का लेक्टुरे है और हम साथ हो
मैंने कागज की प्लान बना कर तुम्हें भेजी
पैर लगी मास्टर के हाँथ ho