Sunday, July 17, 2011

व्यथा

निकट निरंटर देख सत्रू सामंत
विकत संकट युक्त रावन सुने भ्राता अंत
जो थे काल जाई रक्ष कुल नायक
थे आज पड़े खंडीत सुनील के समान्त||

विह्वल मन दशानन शुक संतप्त लंका मैं
एकल मन विचरते सम्रंगन शंका से
यह युद्ध है उपस्थीत गो चारो क चार से
या गिरी है गाज हमारे ही चल से ||

सुना था न कभी यूं तरते पाशान को
बेध दे वज्र तुल्ये वक्ष उस बाण को
हे शिव क्या करून मानूष राम को ||

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